रविवार

स्ट्रोक बचावऔर कारण

आज पूरे संसार में स्ट्रोक के कारण बहुत लोगों को अपनी जान गंवानी पड रही है पूरे विश्व में ह्दय रोग के बाद दूसरा कारण स्ट्रोक से होने वाली मौत का सबसे बड़ा कारण है!       https://vinaysinghsubansi.blogspot.com
                          
आजइसके कारण कितने लोग अपाहिज हो जाते हैं क्योंकि यह दिमाग के कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने के साथ हर सेकंड में 32 हजार कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है जिसके कारण हमारे दिमाग की स्थिति धीरे धीरे छिड़ होने लगती है और नर्वस सिस्टम हो जाता है जो धीरे धीरे मौत के तरफ धकेलने लगती है          इसका मुख्य कारण - डायबिटीज से होता है खतरा डायबिटीज से खून की नलियों में प्रभाव पड़ता है दिमाग की नलियों में रक्त का प्रवाह पडता है दिमाग की नलियों में पतली परत होती है जो डायबिटीज के कारण नष्ट हो जाती है जो कोलेस्ट्रॉल बढने का कारण है और जहां ये कमजोर पडती है उस स्थान पर ही अटैक आता है   
जीवन जीने की कला हम और हमारा समाज  
       डायबिटीज सीधे तौर पर इसका मुख्य कारण नहीं है लेकिन इसके कारण जो हमारे पूरे शरीर पर प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे हमारे नलियों को प्रभावित करती है यह धीरे धीरे रुकावटें पैदा करती है जो आगे चलकर बड़ी हो जाती है जिस जगह इनका प्रभाव ज़्यादा पडता है उस जगह पर खून का प्रभाव खत्म हो जाता है और वह उसी स्थान पर अटैक करती है जहां रक्त का प्रवाह रुक गया हो इसके कारण लकवा मार जाता है शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर देती है इस दौरान अगर हम दो से तीन घंटे में डाक्टर के पास ले जा सके तो डॉक्टर हमे खून पतला करने वाले दवा दे कर उस जगह रक्त प्रवाह को चलने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तथा रोगी के ब्लडप्रेशर के साथ डायबिटीज दवा के साथ कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम दवा के साथ इलाज की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के साथ उस पर प्रभाव पडे जगहों पर मालिश कर रोगी को स्वस्थ होने की संभावना को आगे बढाता है। हाइ बीपी मुख्य कारण - स्ट्रोक के मुख्य तौर पर तीन भागों में बांटा जा सकता है इंबोलिक, थ्राम्बोटिक, और हेमरेज स्ट्रोक होता है जिसकी अवस्था है हमारे नसों पर ज़्यादा दबाव पडता है और दबाव के कारण नशे फट जाती है और खून जमा हो जाता है और इसके कारण से इंबोलिक स्ट्रोक और थ्राम्बोटिक स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है और हाइ बीपी के कारण लकवा मार देता है!                 दिमाग--- की बात करे तो दिमाग दो भागों में बंटा हुआ है दायां और बाया हमारे बोलने, समझने का काम बाया वाला दिमाग करता है अगर हमारे बाया वाले हिस्से पर अटैकआता है तो हमारे बोलनेऔर समझने की शक्ति पर प्रभाव पड़ता है ट्रामा से प्रभावित - कई बार यैसा होता है कि किसी दुर्घटना के कारण हमारे दिमाग में चोट लग जाने पर खून का धक्का जम जाता हैऔर रक्त प्रवाह में रुकावट पैदा होती है जिसके कारण हमें लकवा मार जाता है ब्रेन स्ट्रोक - हमारे नसों के द्वारा दिमाग़ तक रक्त पहुचाने का कार्य होता हैअगर किसी कारण रक्त हमारे दिमाग तक नहीं पहुंच पाती है तो दिमाग ठीक से काम नहीं कर सकता है क्योंकि दिमाग में मौजूद सेल्स ब्लड में मौजूद आक्सीजन के कारण जिन्दा रहते हैं दिमाग में जरूरत के मुताबिक ब्लड की कमी से सेल्स नष्ट होने लगते हैं और दिमाग को प्रभावित पडने लगता है जिससे सिकुड़ने लगता है और स्ट्रोक होता है शरीर के किसी भी भाग में लकवा मार जाता है ब्लाकेज के लिए सर्जरी कराइ जाती है, ठंड से ब्लड का धक्का लगता है जिसके कारण स्ट्रोक होता है कुछ और रोग है जिसके कारण स्ट्रोक होता है जैसे टीबी, आर्थराइटिस के कारण रक्त प्रवाह में प्रभाव पडता है! 

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सोमवार

छठ पूजा

छठ पूजा के लाभ और पर्यावरण महिमा      वैसे तो विशेष रूप से इसकी कोई तिथि नहीं है कि इसकी शुरुआत कहा से हुई सब की अलग अलग धारणाएं हैं           
                         छठ पूजा की शुरुआत                                         वैसे तो विशेष रूप से इसकी कोई तिथि नहीं है कि इसकी शुरुआत कहा से हुई सब की अलग अलग धारणाएं हैं महाभारत काल युग में जब कुंती ने सूर्य की उपासना की तब उनको कर्ण पुत्र को प्राप्ति हुई और द्रोपदी ने भी सूर्य की पूजा की सुर्य को जल अर्ग देकर ब्रत रखा इस प्रकार पांडवों के दुख दूर हुए! तब उनको राज्य मिला विश्वास पर निर्धारित मापदंड के अनुसार सूर्य देव की बहन छठ मैया है उनको प्रसन्न करने के लिए सूर्य की उपासना और अर्घ दिया जाता है पानी में खड़े होकर सूर्य की उपासना और अर्घ दिया जाता है गंगा नदी यमुना नदी तथा पोखरा तालाबों के किनारे पानी में हिल कर सूर्य की उपासना और अर्घ दिया जाता है जिससे वह प्रसन्न होकर हमारे सभी कामनाओं को पूरा करते हैं छठ पूजा चार दिन का त्योहार है कार्तिक मास शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक के इस पर्व के दौरान व्रती लगातार 36 घंटों का व्रत रखकर वे पानी भी ग्रहण नहीं करती है  प्रथम दिन नहाय - खाय के रूप में मनाया जाता है नहाय - खाय के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना किया जाता है पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाली व्रती शाम को गुड़ से बनी खीर रोटी व फल का सेवन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं इसके उपरांत व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हैं व्रत के समाप्ति पर ही व्रती अन्य जल ग्रहण करती है मान्यता है कि पूजन से ही व्रती के घर में देवी षष्ठी का आगमन हो जाता है है षष्ठी को घर के पास नदी जलाशय तालाब पर सब जुटकर अस्ताचलगामी व दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व की समाप्ति होती है
        सूर्योदय का सूर्योपासना का महापर्व छठ पूजा के विशेष रूप से शुद्धि और पवित्रता के साथ समाज हितों की रक्षा के लिए जितना जरूरी है उसी तरह हमे इसे जीवनी जिवन जिने का एक प्रमुख हिस्सा हमारे शरीर और मन को शांति के साथ एक अलग ही शक्ति प्रदान करता है छठ जग में विशेष पवित्रता व शुचिता के लिए जाना जाता है इसमें सभी लोगों के हित की भावना है सूर्य षष्ठी व्रत होने से इसे छठ पूजा कहा गया है छठ पूजा वैसे तो साल में दो बार मनाया जाता है वस्तुतः हमे पहली और दूसरी तिथियों का विमोचन कर रहे हैं  पहला चैत्र मास में दूसरा कार्तिक मास में चैत्र शुक्ल पक्ष  पहला हम चैत्र मास में शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैत्री छठ व कार्तिक मास में कार्तिक छठ पूजा के नाम से जाना जाता है यह त्योहार हमारे देश में बिहार और उत्तर प्रदेश झारखंड के साथ पूरे देश में मनाया जाता है यह त्योहार विशेष रूप से सुख समृद्धि और शांति प्रदान मनोकामनाएं पूर्ति का त्योहार है जिसे सभी मिलकर मनाते हैं चाहे वह स्त्री हो या पुरुष सभी मिलकर मनाते हैं!                                                              
नहाय - खाय      पहला दिन नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है साफ सफाई कर पवित्र कर लिया जाता है छठव्रती स्नान कर शुद्ध होकर शाहकारी भोजन ग्रहण कर व्रत शुरू करते हैं घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन उपरांत ही भोजन करते हैं भोजन के रूप में कद्दू चावल दाल व चने की दाल को ही ग्रहण करते हैं नहाय खाय शुध्दि का रुप हैं!                                              लोहंडा और खरना     दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रती दिनभर उपवास करने के बाद शाम को भोजन ग्रहण करती है इसे खरना कहते हैं खरना का प्रसाद लेने के लिए आस पास के सभी लोगो को निमंत्रण दिया जाता है प्रसाद के रूप में गाय के दूध में बने चावल की खीर के साथ दूध चावल का पिट्टा व घी चुपडी रोटी बनाई जाती है इसमें नमक और चीनी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है शुध्दता का बड़ा महत्व और ध्यान दिया जाता है यही है खरना                                                             संध्या अर्घ      तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन झट प्रसाद बनाया जाता है प्रसाद के रूप में ठेकुआ बनाते हैं इसके अलावा चावल के लड्डू चढावे के रूप में लाया गया सांचा और फल भी झट प्रसाद के रूप में शामिल किया जाता है सूर्य को जल व दूध का अर्घ दिया जाता है तथा छठी मैया की सूप से भरे प्रसाद से पूजा जाता है पूरा मेले के समान हो जाता है                                     उषा अर्घ          चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्पति के दिन सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है व्रती फिर वही एकट्ठी होते हैं जहां शाम को अर्घ्य दिया था पिछली शाम की प्रक्रिया दोहराई जाती है अंत में व्रती कच्चे दूध का शर्बत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पुरा होता है! छठ पूजा पर्व की महिमा शक्ति रुप                      छठ पूजा पर्व
की महिमा                    छठ पूजा का उल्लेख हमे अपने पुराणों में वर्णित है और लेख मिलता है मैथिल वर्षकृत्य विधि में भी प्रतिशर षष्ठी की महिमामंडन का उल्लेख किया गया है बताया जाता है कि सूर्य पुत्र अंगराज कर्ण जल में खडे होकर सुर्य की उपासना करते थे सूर्याध के बाद व्रतीयो से प्रसाद मागकर खाने का प्रवधान है प्रसाद में श्रतुफल के अतिरिक्त गेहूं के आटे व गुड़ से बने शुद्ध घी बने ठेकुआ व चावल के आटे व गुड़ से बने भूसवा का होना अनिवार्य है षष्ठी को करीबी नदी या जलाशयों के तट पर अस्ताचलगामी और दूसरे दिन उदयमान सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा समाप्त किया जाता है                                                             सूर्य के प्रभाव से बचने के लिए                           गावों में जहाँ शुद्धता के लिए गाय के गोबर से पुरे जगहों पर लेप कर शुद्ध किया जाता है व्रती को अलग कमरा दिया जाता है जहां आना जाना कम हो अगर कोई उस जगह जाता है तो नहा धोकर हाथ पाँव धोकर जाता है धारणाएं हैं कि अगर एक गल्ती होने पर सूर्य देव रुष्ट हो जाते हैं और उसका दुष्प्रभाव पडता है छठ पूजा का खास प्रसाद ठेकुआ गेहूं के आटे में घी व चीनी मिलाकर बनाया जाता है हथचक्की या जात में पीसती महिलाएं गीत गाते हुए छठ मैया की बहुत ही सुंदर दृश्य लगता है!                                       विश्वस्य हि प्राणनं जीवनं त्वे वि यदुच्छसि सूनर!!   सा नो रथेन बृहता विभावरी श्रुधि चित्रामघे हवम्!!
पर्यावरण तथा वैज्ञानिक प्रमाण                          जहा हमारे शरीर का निर्माण पाच तत्व से किया गया है पाच तत्व, मिट्टी, जल, अग्नि, गगन, और समीर से बना है इन सब में सूर्य की महत्वपूर्ण भूमिका है हमे वैज्ञानिक आधार पर परिमाणित है सूर्य से पृथ्वी पैदा होती है पृथ्वी से हम सबके शरीर निर्माण होते हैं सुर्य हमारे महापिता के रूप में व्यस्थापित है सूर्य हमारे रोम रोम में बसे हैं सूर्य हमारे दैनिक जीवन में एक सन्तुलन को कायम रखने के लिए हमें स्वस्थ रहने के लिए जितना जरूरी है उसी तरह हमारे हड्डियों में हमारे नसों में प्रवाह रहते हैं सूर्य हमारे उर्जा के श्रोता है जहाँ हमारे देश में सूर्य की महत्ता इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ सुर्य हमारे संस्कृति में हर जगह विद्वान है!  पर्यावरण संरक्षण व छठ पूजा में गहरा संबंध है छठ पूजा में प्रसाद के रूप में नयी फसलों का उपयोग किया जाता है सिघांडा, नीबू, हल्दी, अदरक, नारियल, केला संतरा, सेब के साथ साथ आटा चीनी व घी के मिश्रण से बने ठेकुआ जैसी बनी चीजें हमे प्राकृतिक के प्रति लोगों का अटूट विश्वास पैदा करती है मिट्टी के बने हाथी चढाएं जाते हैं जो जीव जंतु संरक्षण का उदाहरण है लकड़ी पर बने प्रसाद जहां व्रती का वर्त शरीर की सफाई के साथ हमारे आसपास की सफाई का महत्वपूर्ण योगदान है! 

बुधवार

डेंगू व चिकनगुनिया बुखार

डेंगू और चिकनगुनिया बुखार मच्छर के काटने से होता है। डेंगू बुखार जो मादा मच्छर के काटने से होता है। इस मच्छर का नाम दिया गया है मादा एडीज इजिप्टी यह मच्छर अक्सर दिन में ही काटते हैं और इसकी पहचान इसके शरीर पर चिते जैसी लाल रंग की धारिया होती है अक्सर यह बरसात के मौसम में ही इसका बिकास होता है और यह मुख्यतः जुलाई से अक्टूबर के बीच ज्यादा सक्रिय रूप से फैलता है। डेंगू बुखार के शुरुआती लक्षण तो जल्दी समझ में नहीं आता है लेकिन चिकनगुनिया में लक्षण चार पांच दिन के बाद मरीजों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं मरीज को तेज बुखार के साथ जोडो में दर्द रहता है सिर में दर्द और आखों में कष्ट के साथ हथेली और पैरों में रैशेज जकड़न हो जाती है जोडो में दर्द के साथ सूजन आ जाती है और ज्यादा परेशानी सुबह रहती है। डेंगू के लक्षणों के दिखाई देने पर तुरंत ही इलाज और इसका बचाव किया जाना चाहिए अन्यथा यह मौत का कारण बन सकता है इसका बचाव ही हम सबको डेंगू से लड़ने से सुरक्षित रख सकता है।।  ।। ।।..
चिकनगुनिया के लक्षण - हथेलियों में और पैरों के साथ जकडन और रैशेज हो जाता है।,   जहां जोडो के दर्द के साथ इसमें सूजन आ जाती है। और अक्सर दर्द प्रातःकाल में ज्यादा से ज्यादा महसूस होता है ज्वॉइन्ड में सभी जगह उभर कर आ जाते हैं     दर्द के साथ सिर दर्द और आखों में कष्ट देते हैं और परेशानी होती है यह बुखार एक दिन से लेकर बाहर से पन्द्रह दिनों तक चलता है ।                                                                                                                                                                                                                डेंगू बुखार के लक्षण - यह अक्सर देर से पता चलता है इसमें कमर दर्द और मांसपेशियों में दर्द रहता है यह शरीर को तोड़ने वाला बुखार और बहुत ज्यादा खतरनाक है यह शरीर को कमजोर कर देता है कमजोरी ज्यादा हो जाती है सबसे ज्यादा इसमें प्लेटलेट्स लगातार गिरते रहते हैं और इसमें प्लेटलेट्स का गिरना ही खतरनाक साबित होता है जहां हमारे चेहरे को काले पन में बदलने लगते हैं लालिमा खत्म होने लगती है चेहरे और त्वचा पर रैशेज होते हैं शौच एकदम से बदल जाता है काला रंग का होने लगता है तथा उल्टियाँ होने लगती है और उल्टियां के साथ बल्ड आने लगता है यह बुखार दो दिन से लेकर सात से आठ दिनों तक रहता है।   डेंगू बुखार ज्यादा खतरनाक - डेंगू बुखार और चिकनगुनिया में तुलना की जाए तो डेंगू बुखार ज्यादा खतरनाक है। डेंगू बुखार तीन प्रकार के होते हैं। साधारण डेंगू बुखार, हैमरेजिक बुखार, और शाँक सिंड्रोम बुखार जिसमें हैमरेजिक बुखार और शॉक सिंड्रोम बुखार बहुत ही खतरनाक होते हैं। यह मुख्यतः साधारण बुखार से शुरूआत होता है जिसका इलाज नहीं होने पर यह हैमरेजिक बुखार और शाँक सिंड्रोम बुखार में बदल जाते हैं और जानलेवा साबित होते हैं अतः शुरुआत में ही जाच कर इलाज किया जाय तो इसपर हम बड़े आराम से काबू पाने सकते हैं।              डेंगू बुखार में हमारे शरीर में प्लेटलेट्स कम होने लगते हैं जिसका असर हमारे शरीर के अंगों पर इसका असर और प्रभाव पडने लगता है इस लिये इस बुखार में पहले प्लेटलेट्स पर काबू पाया जाता है और प्लेटलेट्स पर अगर काबू पा लिए तो फिर यह नार्मल हो जाता है इस बुखार में पैरासिटामोल दिया जाता है। लेकिन इसके जस्ट खतरनाक बुखार हैमरेजिक और शाँक सिंड्रोम बुखार में हमे प्लेटलेट्स चढाये जाते हैं और पूरी तरह से ठीक होने में करीब 12से15 दिन लग जाते हैं। इसमें आयुर्वेद और घरेलू उपाय के द्वारा काबू में रखने के लिए पपीते के पत्ते का रस साथ में तुलसी और गिलोय गुड़ का काढा लेने पर यह कंट्रोल में रहने के साथ धीरे धीरे इसपर काबू पाया जाता है। क्योंकि इससे प्लेटलेट्स और इम्यूनिटी दोनों बढते है जिससे इसको काबू में रखा जाता है।                                                                                                                                             चिकनगुनिया बुखार - यह बुखार मुख्यतः एडीज मच्छर के काटने से होता है और ये मच्छर दिन में ही काटते हैं बुखार होने पर बुखार के साथ सर दर्द और शरीर पर लाल रंग के दाने उभर आते हैं जोडो में दर्द होने लगता है उठना बैठना मुश्किल हो जाता है आखों में दर्द होने लगता है हाथ पैर में सुजन हो जाता है ज्वॉइन्ड में दर्द रहता है इस बुखार का पता तीन चार दिन बाद यह सब लक्षण दिखाई देने लगते हैं इस बुखार में आराम बहुत जरूरी है।
बुखार की पुष्टि - बुखार होने पर अक्सर इसके लिये यह जानकारी रखना जरूरी है कि आपका बुखार एक दिन दो दिन या इससे ज्यादा दिन तक का बुखार है आप कितने दिन में टेस्ट करा रहे हैं। चिकनगुनिया में ब्लड टेस्ट होता है और उसकी पुष्टि हो जाती है। लेकिन डेंगू बुखार के लिए एलिसा टेस्ट होता है और उसके द्वारा ही इसकी पुष्टि होती है। वैसे तो और भी कई टेस्ट हैं पीसीआर टेस्ट यह टेस्ट बुखार होने पर छह से सात दिनों के बाद ही टेस्ट कराया जाता है और चिकनगुनिया हो या डेंगू बुखार हो टेस्ट के बाद पता चल जाता है इस टेस्ट को जीनोमिक टेस्ट कहते हैं। सीबीसी टेस्ट यह टेस्ट प्रारंभिक टेस्ट हैं क्योंकि चिकनगुनिया होने पर हमे इसके वायरल का पता तीन से चार दिनों के बाद ही पता चलता है जिसमें हमें इसके आंशका का पता चलता है इसमें दो दिनों के बाद टेस्ट होता है और टेस्ट के द्वारा हमे व्हाइट ब्लड सेल्स की संख्या का पता चल जाता है। एंटीबॉडीज टेस्ट चिकनगुनिया बुखार में मरीज में वायरस से लड़ने के लिए शरीर में एंटीबॉडीज बनता है इन्हें आइजीएम और आइजीजी कहते हैं आइजीजी चार से पांच दिन बाद बनने शुरू हो जाते हैं और आइजीएम में सात से आठ दिन बाद बनने शुरू हो जाते हैं टेस्ट के आधार पर डाक्टरों को पता चल जाता है आपका बुखार कितने दिनों से है इस टेस्ट को दो तरह से किया जाता है इम्यूनोलांजी और एलिसा जिससे डेंगू बुखार का पता चलता है वायरस आइसोलेशन टेस्ट इस टेस्ट में शुरू के पाच दिनों में किया जाता है और इसके द्वारा डेंगू और चिकनगुनिया का पता चलता है।
साफ-सफाई - चिकनगुनिया में आराम के साथ साफ़ सफाई बहुत जरूरी है और रोगी को ज्यादा से ज्यादा लिक्विड आइटम ही देना चाहिए क्योंकि अक्सर इस बुखार में डिहाइड्रेशन हो जाता है। और इसके साथ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मरीज को अगर अन्य रोग हो जैसे कि डायबिटीज शुगर हाइ बीपी अस्थमा हैं तो डॉक्टर के देख रेख में ही इलाज चलना चाहिए क्योंकि सभी रोगों का एक साथ दवा चलने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। दर्द से छुटकारा पाने के लिए ज्वॉइट के दर्द के लिए आइसपैक लगा सकते हैं।
होम्योपैथिक और आयुर्वेद में इलाज - होम्योपैथिक में चिकनगुनिया बुखार का इलाज है इसमें रसटक्स, बेलाडोना, और जेलसेनियम के द्वारा इलाज किया जाता है  रसटक्स-इसमे रोगी को बुखार के साथ बेचैनी बहुत ज्यादा होती है गला और जीभ सुख जाते हैं।  ठंड के साथ बुखार आए हाथ पैर में दर्द के साथ अगर ऐठन हो तो इसका प्रयोग किया जाता है और इसको लेकर आराम मिलता है इस औषधि को 30 शक्ति में चार बूंद सुबह शाम और दोपहर को लेना चाहिए।
बेलाडोना - इसका प्रयोग अगर रोगी को तेज बुखार हो प्यास नहीं लगे अगर चेहरा लाल हो तमतमाया हो आखों में जलन और लाल हो दर्द के साथ और रोशनी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं सर दर्द के साथ शरीर पर लाल रंग के दाने हो तो इसका प्रयोग बडा प्रभावशालि है इसको इस औषधि को छह शक्ति में हर दो घंटे बाद चार बूंद लेना चाहिए बहुत आराम पहुंचाता है।
जेलसेनियम - अगर रोगी को लगता है कि बुखार में ताप और ठंड दोनों एक के बाद एक बार आता है शरीर में शक्ति नहीं थकावट महसूस हो और प्यास का अभाव हो सारे शरीर में दर्द पीठों में दर्द मांसपेशियों में दर्द हो तो इसका प्रयोग बहुत लाभदायक है इस औषधि को तीन एक्स शक्ति में पांच पांच बूंद पानी के साथ तीन तीन घंटों के दौरान देना चाहिए।
नोट - होम्योपैथिक दवा रोगी के लक्षणों के आधार पर ही दी जाती है विषेश अपने डॉक्टर के देख रेख में ही दवाऔ का प्रयोग करे।
आयुर्वेद - डेंगू बुखार में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के विषेश डॉक्टर के द्वारा ही प्रयोग में लाए। कुछ ऐसी दवाएँ है जो आप डॉक्टर से सलाह लेकर ले सकते हैं जैसे कि सुदर्शन चूर्ण, त्रिभुवन कीर्ति रस, अमरूथारिस्ता, गिलोय, घनवटी, तुलसी, लौंग का काढा, मेथी के पत्ते या उसके बीज के का काढा जो कम से कम तीन घंटों तक पानी में भिगो कर बनाए और उसका प्रयोग करें, यह दवाएँ डेंगू के लक्षण कंट्रोल होने तक लेना चाहिए। और आवश्यक भी है और आप कुछ घरेलू उपाय के द्वारा भी कंट्रोल कर सकते हैं जो शरीर के तापमान दर्द ब्लड प्लेटलेट्स में मददगार के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता इम्यूनिटी बढाने के लिए मददगार साबित होती है।
घरेलू उपाय - लौंग और इलायची का काढा बना कर पियें। तुलसी के पत्तों और काली मिर्च सौठ इलायची और थोड़ा गुड़ को मिलाकर उबालकर काढा बनाकर पियें जो बहुत आराम मिलता है।  मेथी के पत्ते या बीज का पानी में भिगो कर काढा बनाए कमसे कम एक घंटे तक भिगोए फिर प्रयोग में लाए। अमृता या गिलोय गुड़ के साथ काढा बनाए और इसका प्रयोग करें। पपीते के पत्ते का रस बनाकर पियें जो काफी फायदेमंद है।  किशमिश को भिगोकर पीसकर जो तैयार जूस हो उसका तीन चार बार प्रयोग करें।  अदरक और आवला का रस प्रयोग में लाए। ठंडे दूध में क्वाटर चम्मच हल्दी मिलाकर पीने से लाभ होता है।   दाल चीनी का पावडर गर्म पानी में मिलाकर पीने से लाभ होता है।  लहसुन का भी सुबह खाली पेट लेने से आराम मिलता है लहसुन एक फाक वाला इस्तेमाल में लाए।।                                                                                                                                                                         इससे बचने के उपाय - घर को साफ सुथरा रखे घर में नीम के सुखे पत्ते और कपूर जलाये जो धूआ हो उसको पूरे घर में फैलाये। घर में तुलसी का पौधा लगाये शरीर को हमेशा ढक कर रखे मच्छर दानी का प्रयोग करे घर में कहीं भी पानी इकठ्ठा नहीं होने दे कूलर एसी फ्रिज के ट्रे में पानी इकट्ठा न होने दें जमे हुए पानी में मिट्टी का तेल डालें खुली हुई नालियों में 50 से 100 एमएम पेट्रोल डाले लहसुन को पानी में उबालकर इस पानी छिड़काव दरवाजे और खिड़कियों पर करे। नीम के तेल शरीर में लगाये।।
मच्छर की प्रजातियां - मच्छरों की प्रजातियां करीब पूरे विश्व में 2700 प्रजातियां हैं। मच्छरों की कुछ प्रजातियां 100 मिल तक प्रवास कर सकती है। मच्छरों का अस्तित्व करीब चालीस करोड़ साल पहले से ही विद्यमान है। मच्छरों की गति करीब डेढ़ मील प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकते हैं। एक मच्छर का वजन करीब 2.5 मिलीग्राम होता है मादा मच्छरों को अंडों को निषेचित करने के लिए खून की जरूरत होती है नर मच्छरों के ऊपर अंडों की जिम्मेदारी नहीं होती है इसलिए वह काटते नहीं है। जब वह खून चूसते है उस दौरान वह लार का स्राव करते हैं जो खून को जमने नहीं देता है इसी वजह से एलर्जिक रिएक्शन होता है और काटने के स्थान पर खुजली होती है मच्छर 80 डिग्री फॉरेनहाइट पर बेहतर तरीके से काम करते हैं 60 डिग्री पर वह सुस्त पड़ जाते हैं और 50 डिग्री फॉरेनहाइट से कम तापमान पर वह कार्य नहीं कर सकते हैं 100+ मच्छर कार्बन डाई आक्साइड को 100 फिट दूर से भी महसूस कर सकते हैं। पूरी दुनिया में 2700 प्रजातियां पाई जाती है जबकि 176 प्रजातियां अकेले अमेरिका में है भारत में एनोफिलीज प्रजातियां ही मच्छरों को रोग के प्रकार के लिए जिम्मेदार माना जाता है। मच्छर के विकास के लिए पानी का मुख्य योगदान है इस लिये वह उसी जगह पैदा पलते बढते है जहां पानी जमा हो।

शुक्रवार

अल्जाइमर्स क्या है

  1. अल्जाइमर्स क्या है और इसका मुख्य कारण क्या है अल्जाइमर्स आज दुनिया में 4.2 करोड़ लोग पीडि़त हैं लेकिन भारत देश सहित कुछ अन्य देश में अल्जाइमर्स से लड़ने की क्षमता पायी गयी है इसका मुख्य कारण है कि यहाँ के लोग ज्यादा पौधों से प्राप्त खाद्य सामग्रियों की अधिकता ज्यादा होती है और मांस की मात्रा कम होती है
  • आज पूरा संसार इससे पीडि़त हैं एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है और उसके अनुसार भारत, जापान और नाइजीरिया के पारंपरिक आहार में अल्जाइमर्स से लड़ने की क्षमता पायी गयी है इसका मुख्य वजह यह है कि इनमें पौधों से प्राप्त खाद्य सामग्रियों की अधिकता और मांस की मात्रा कम होती है आज जो कुछ क्या पुरे पश्चिमी देशों में जो उनका आहार है उसमें अत्यधिक मात्रा में मांस  अत्यधिक मात्रा में दुग्ध उत्पाद और मीठे की मात्रा तथा साथ में वसा वाले भोज्य पदार्थ की अधिकता ज्यादा होती है यही कारण है कि अल्जाइमर्सहोनेकाखतरा बढ़ जाता है
  • आज पूरा संसार इससे पीडि़त हैं एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है और उसके अनुसार भारत, जापान और नाइजीरिया के पारंपरिक आहार में अल्जाइमर्स से लड़ने की क्षमता पायी गयी है इसका मुख्य वजह यह है कि इनमें पौधों से प्राप्त खाद्य सामग्रियों की अधिकता और मांस की मात्रा कम होती है आज जो कुछ क्या पुरे पश्चिमी देशों में जो उनका आहार है उसमें अत्यधिक मात्रा में मांस  अत्यधिक मात्रा में दुग्ध उत्पाद और मीठे की मात्रा तथा साथ में वसा वाले भोज्य पदार्थ की अधिकता ज्यादा होती है यही कारण है कि अल्जाइमर्स होने का खतरा बढ़ जाता है
एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है जर्नल ऑफ द अमेरिकन कालेज आफ न्यूट्रिशन में छपी खबर के अनुसार भूमध्य सागरीय और पश्चिम देशों में रहने वाले लोगों के आहार के बीच में तुलनात्मक रूप से अध्ययन करने के बाद यह पाया गया कि पश्चिमी देशों के खान पान भूमध्य सागरीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का आहार खान पान को अल्जाइमर्स को दो गुना बढ़ावा देते हैं इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले बी ग्रांट सैन फ्रांसिस्को कैलिफोर्निया के सनलाइट न्यूट्रिशन एंड हेल्थ रिसर्च सेंटर के प्रोफेसर हैं उनके अनुसार भूमध्य सागरीय क्षेत्र मुख्य तौर पर भारत, जापान और नाइजीरिया के लोगों का आहार साग सब्जी पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है और मांस की मात्रा कम होती है इस लिये पश्चिम देशों की तुलना में इनका आहार अल्जामर्स का खतरा 50%तक कम करता है! 
  1. इस तरह यह जानकारी हमें मिलती है कि ज्यादा फल सांग सब्जी अनाज कम वसा वाले दुग्ध उत्पाद दालें और मछली का सेवन अल्जामर्स के खतरे को कम करने के लिए ज्यादा ताकतवर है 
  2. इस रिपोर्ट को जानने के लिए वैज्ञानिकों ने एक साथ कई देशों का क्या खान पान है और क्या प्रचलित आहार अल्जामर्स के खिलाफ कितना कारगर है यह जानने के लिए वैज्ञानिकों ने भारत के साथ और देश ब्राजील, चिली, जापान, क्यूबा, नाइजीरिया, मिस्र, मंगोलिया, कोरिया, श्रीलंका, और अमेरिका जैसे देशों का दौरा कर उनके द्वारा उनका खान पान बीते डेढ़ दो दशकों में इनमें आये बदलाव अल्जाइमर्स से लड़ने की क्षमता पर पडे असर का मुख्यतः विश्लेषण किया गया! अन्तहः इस दिशा में मुख्य रूप से निष्कर्ष निकाला गया है ज्यादा पौधों से प्राप्त खाद्य सामग्रियों की अधिकता तथा मांस की मात्रा कम इस्तेमाल में लाने वाले देश के लोगों में अल्जाइमर्स से लड़ने की क्षमता ज्यादा पाइ गई है! 

शनिवार

स्वामी रामकृष्ण परमहंस

कोटी-कोटी वन्दन 16 अगस्त आज पुण्यतिथी स्वामी रामकृष्ण परमहंस: वे एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर ज़ोर दिया था। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्मसच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं।
जीवन परिचयात्मक रुप - 

रामकृष्ण परमहंस ने पश्चिमी बंगाल (WEST Bengal) के हुगली ज़िले में कामारपुकुर नामक ग्राम के एक दीन एवं धर्मनिष्ठ सदाचारी कर्मनिठ  धर्म  परिवार मे 18 फ़रवरी, सन् 1836 ई. में जन्म लिया। किशोर ््अवस्था सबमें वयस्क होने पर पूरे समाज में  वह गदाधर के नाम से प्रसिद्ध थे। गदाधर के पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय निष्ठावान ग़रीब ब्राह्मण थे। गरीब रहते हुए भी वह अपनी धर्मनिस्ठापअपने साधु माता-पिता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने गाँव के भोले-भाले लोगों के लिए भी शाश्वत आनंद के केंद्र थे। अपने कर्तव्यों के प्रति सदा परोपकारी समाज की भलाई के लिए सदा अग्र सर रहते हुए धर्म के मार्ग में श्रेष्ठ ुउदाहरणके रूप में स्थापित हुए उनका सुंदर स्वरूप, ईश्वरप्रदत्त संगीतात्मक प्रतिभा, चरित्र की पवित्रता, गहरी धार्मिक भावनाएँ, सांसारिक बातों की ओर से उदासीनता,  तथा सदा आकस्मिक रहस्यमयी समाधि, और सबके ऊपर उनकी अपने माता-पिता के प्रति अगाध भक्ति इन सबने उन्हें पूरे गाँव का आकर्षक व्यक्ति बना दिया था।समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग और निष्पक्ष कर्तव्य उनका एक प्रमुख हिस्सा और सदाचारी सन्देश था  गदाधर की शिक्षा तो साधारण ही हुई, किंतु पिता की सादगी और धर्मनिष्ठा का उन पर पूरा प्रभाव पड़ा। परमहंस का शुरुवाति जिवन बडा सब्ज संघर्ष तथा उनके कर्तव्य धर्म के रूप में श्रेष्ठ उदाहरण है जब वे 7 वर्ष के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया।
दर्शन से कृतार्थ के रूप में स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी-स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने जब समाज की स्थापना की नई रुपी स्वरुप  जगन्माता की पुकार के उत्तर में गाँव के वंशपरंपरागत गृह का परित्याग कर दिया और सत्रह वर्ष की अवस्था में कलकत्ता चले तथा  यहां से उन्होंने एक नई दिशा देने के लिए तथा हमे और  हमारे समाज के लिए हमें मार्ग दर्शन दिए  कलकत्ता में झमपुकुर में अपने बड़े भाई के साथ ठहर गए, और कुछ दिनों बाद भाई के स्थान पर रानी रासमणि के दक्षिणेश्वर मंदिर कोलकाता में पूजा के लिये नियुक्त हुए। यहां पर माँ काली पूजा में सदा के लिए विलीन हो गये यहीं उन्होंने माँ महाकाली के चरणों में अपने को उत्सर्ग कर दिया। रामकृष्ण परमहंस भाव में इतने तन्मय रहने लगे कि लोग उन्हें पागल समझते। सभी ने कहा कि वह मेंटल डिस्टर्ब है  वे घंटों ध्यान करते और माँ के दर्शनों के लिये तड़पते। जगज्जननी के गहन चिंतन में उन्होंने मानव जीवन के प्रत्येक संसर्ग को पूर्ण रूप से भुला दिया।  मां काली के दर्शन के लिए सदा उनके आगास में खो गए माँ के दर्शन के निमित्त उनकी आत्मा की अंतरंग गहराई से रुदन के जो शब्द प्रवाहित होते थे वे कठोर हृदय को दया एवं अनुकंपा से भर देते थे। अंत में उनकी प्रार्थना सुन ली गई और जगन्माता के दर्शन से वे कृतकार्य हुए। यही नहीं ये तो मात्र ये शुरूवात थी 
किंतु यह सफलता उनके लिए केवल संकेत मात्र थी। परमहंस जी असाधारण दृढ़ता और उत्साह से बारह वर्षों तक लगभग सभी प्रमुख धर्मों एवं संप्रदायों का अनुशीलन कर अंत में आध्यात्मिक चेतनता की उस अवस्था में पहुँच गए जहाँ से वह संसार में फैले हुए धार्मिक विश्वासों के सभी स्वरूपों को प्रेम एवं सहानुभूति की दृष्टि से देख सकते थे यही से स्वामी रामकृष्ण परमहंस बने तथा समाज में व्याप्त रूप से विस्थापित हुए अमरत्व रुपी समाज में व्याप्त होकर सदा के लिए अमर हो गये हमे अटूट विश्वास के रूप में स्थापित किया समाज को एक नई दिशा तथा नया रूप दिया |
आध्यात्मिक विचारधारा समाज रुपी - हम और हमारा समाज 
अतः हम जानते हैं कि मानव जाति समाज कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए जितना धर्म रुप से एक मुकाम हासिल कर सम्मानित रूप से धर्म निष्ठा होकर स्थापित हुए और इस तरह  स्वामी मरमहंस जी का जीवनशैली जीवन द्वैतवादी पूजा के स्तर से क्रमबद्ध आध्यात्मिक अनुभवों द्वारा निरपेक्षवाद की ऊँचाई तक निर्भीक एवं सफल उत्कर्ष के रूप में पहुँचा हुआ था। और वह उस उचाई को पाया जहां से वे मांकाली को साक्षात रूप से दर्शक दर्शन किए ,  भक्ति करके अपने जीवन काल में ही देखा कि उस परमोच्च सत्य तक पहुँचने के लिए आध्यात्मिक विचार-द्वैतवाद, संशोधित अद्वैतवाद एवं निरपेक्ष अद्वैतवाद, ये तीनों महान श्रेणियाँ मार्ग की अवस्थाएँ थीं। वे एक दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि यदि एक को दूसरे में जोड़ दिया जाए तो वे एक दूसरे की पूरक हो जाती थीं एक रास्ता मार्ग दर्शन देने की अभिव्यक्ति अभिलाषा ने उन्हें एक सम्पूर्ण विश्व को तथा समाज को अपनी भक्ति को चमत्कारी रुप से स्थापित किया '|
विवाह बालवस्था रुप - बंगाल पश्चिमच  बंगाल मेजहां बाल विवाह की पर्थ प्रथा है यहाँ बाल विवाह की प्रथा है। गदाधर का भी विवाह बाल्यकाल  में हो गया था।जो बचपन में ही हो गया था कलकत्ता में  उनकी बालिका पत्नी शारदामणि जब दक्षिणेश्वर आयीं तब गदाधर वीतराग परमंहस हो चुके थे। माँ शारदामणि का कहना है- "ठाकुर के दर्शन एक बार पा जाती हूँ, यही क्या मेरा कम सौभाग्य है?" परमहंस जी कहा करते थे- "जो माँ जगत का पालन करती हैं, जो मन्दिर में पीठ पर प्रतिष्ठित हैं, वही तो यह हैं।" ये विचार उनके अपनी पत्नी माँ शारदामणि के प्रति थे।तथा सदा ही महिलाओं के प्रति मां काली के रूप में देखा तथा सदा उनको देवी के रूप में देखा ये उनके लिए शक्ति रूपी जगत माता के रूप में प्रतिष्ठित किया 
उनके सदा अमर अमृतोपदेश - 
एक एक शब्द अमरत्व  को प्राप्त प्रदान करता है एक सन्ध्या को सहसा एक वृद्धा सन्न्यासिनी स्वयं दक्षिणेश्वर पधारीं। वहां पर स्वामी मरमहंस रामकृष्ण को पुत्र की भाँति उनका स्नेह प्राप्त हुआ और उन्होंने परमहंस जी से अनेक तान्त्रिक साधनाएँ करायीं।जहां उनकी ज्ञान  की प्राप्ति तथा अन्य कई तरह की विशेष जिज्ञासा के साथ भक्ति शिद्धीयान के साथ अस्थापित हुई इसके अततिरिक्त तोतापुरी नामक एक वेदान्ती महात्मा का भी परमहंस जी पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। उनसे परमहंस जी ने अद्वैत-ज्ञान का सूत्र प्राप्त करके उसे अपनी साधना से अपरोक्ष किया। परमहंस जी का जीवन विभिन्न साधनाओं तथा सिद्धियों के चमत्कारों से पूर्ण है, किंतु चमत्कार महापुरुष की महत्ता नहीं बढ़ाते। परमहंस जी की महत्ता उनके त्याग, वैराग्य, पराभक्ति और उस अमृतोपदेश में है, जिससे सहस्त्रों प्राणी कृतार्थ हुए, जिसके प्रभाव से ब्रह्मसमाज के अध्यक्ष केशवचन्द्र सेन जैसे विद्वान भी प्रभावित थे।जिस कारण अनेक प्रकार के मनुष्य जीवन प्रभावित हुए जिस प्रभाव एवं आध्यात्मिक शक्ति ने नरेन्द्रजैसे नास्तिक, तर्कशील युवक को परम आस्तिक, भारत के गौरव का प्रसारक स्वामी विवेकानन्द बना दिया।जो व्यक्ति विश्व प्रसिद्ध को प्राप्त किया  स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का अधिकांश जीवन प्राय: समाधि की स्थिति में ही व्यतीत हुआ। जीवन के अन्तिम तीस वर्षों में उन्होंने काशी, वृन्दावन, प्रयाग  आदि तीर्थों की यात्रा की। उनकी उपदेश-शैली बड़ी सरल और भावग्राही थी। वे एक छोटे दृष्टान्त में पूरी बात कह जाते थे। स्नेह, दया और सेवा के द्वारा ही उन्होंने लोक सुधार की सदा शिक्षा दी।अन्त में श्रेष्ठ की उच्चतम सिद्धिया प्राप्त हुई जो मानव की विस्वास को परिभाषित करती है 
अध्ययन तथा आध्यात्मिक प्रेरणा-
समय के साथ  जैसे-जैसे व्यतीत होता गया, उनके लगन और आस्था में दृढता बढती गई  उनके कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे और दक्षिणेश्वर का मंदिर उद्यान शीघ्र ही भक्तों एवं भ्रमणशील सन्न्यासियों का प्रिय आश्रयस्थान हो गया।  उनकी प्रसिद्धया बढती गई कुछ बड़े-बड़े विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं. नारायण शास्त्री, पं. पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते रहे। जो उनके कठोर परिश्रम को देखते हुए वह शीघ्र ही तत्कालीनन सुविख्यात विचारकों के घनिष्ठ संपर्क में आए जो आगे चलकर पूरे बंगाल में मुख्य रूप से  जो बंगाल में विचारों का नेतृत्व कर रहे थे। इनमें केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चटर्जी, अश्विनी कुमार दत्त के नाम लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग था जिसके सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, महेंद्रनाथ गुप्त (मास्टर महाशय) और दुर्गाचरण नाग थे।जहां पर जाकर  उनकी जगन्माता की निष्कपट प्रार्थना के फलस्वरूप ऐसे सैकड़ों गृहस्थ भक्त, जो बड़े ही सरल थे, उनके चारों ओर समूहों में एकत्रित हो जाते थे और उनके उपदेशामृत से अपनी आध्यात्मिक पिपासा शांत करते थे।यही से एक नाम और जुडा जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद जी के रूप में विश्व विख्यात हुआ कहने का तात्पर्य यह है कि उनके शक्तियों का मूल्यांकन किया और पुरे संख्या में लोगों तक पहुंचाने में मुख्य धारा में शामिल हुए 
समाजिक आध्यामिक बंधुत्व-
आचार्य स्वामी परमहंस जी समाजिक उत्थान के लिए अपने जीवन न्योछावर कर दिया  अन्तिम समय में  वर्षों में पवित्र आत्माओं का प्रतिभाशील मंडल, जिसके नेता नरेंद्रनाथ दत्त (बाद में स्वामी विवेकानंद) थे, रंगमंच पर अवतरित हुआ। आचार्य स्वामी परमहंस  ने चुने हुए कुछ लोगों को अपना घनिष्ठ साथी बनाया, त्याग एवं सेवा के उच्च आदर्शों के अनुसार उनके जीवन को मोड़ा और पृथ्वी पर अपने संदेश की पूर्ति के निमित्त उन्हें एक आध्यामिक बंधुत्व में बदला। सभी जगहों पर इनकी सिद्धिया प्रचारित हुए  आचार्य के ये दिव्य संदेशवाहक कीर्तिस्तंभ को साहस के साथ पकड़े रहे और उन्होंने मानव जगत की सेवा में पूर्ण रूप से अपने को न्योछावर कर दिया।जो सदैव के लिए अमर हो गये इस तरह उनके कर्त्तव्य हमें शक्ति प्रदान करते हैं 
समाजिक आधारशिला महानिर्वाण के रूप - 
आचार्य परमहंस जी बहुत ही अधिक कार्य रत रहे उनके जीवन में एक सन्तुलन को कायम रखने के लिए जितना जरूरी समस्याओं को अपने उपर ले लेना दुसरो कीदुखता को कम करता है अधिक दिनों तक पृथ्वी पर नहीं रह सके। परमहंस जी को 1885 के मध्य में उन्हें गले के कष्ट के चिह्न दिखलाई दिए। शीघ्र ही इसने गंभीर रूप धारण किया जिससे वे मुक्त न हो सके। और इनका अन्तिम समय सिद्ध साबित हुआ 6 अगस्त, सन् 1886 को उन्होंने महाप्रस्थान किया। पूरे समाज में व्याप्त हो गये कलकत्ता में ध्यान गति को प्राप्त हुए सेवाग्राम के संत के शब्दों में 'उनका जीवन धर्म को व्यवहार क्षेत्र में उतारकर मूर्तस्वरूप देने के प्रयास की एक अमरगाथा है,।जो सदैव के लिए विद्यमान अमर है जिनकी गाथा ही काफी है |

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मनुष्य का सबसे बड़ा धन उसका स्वस्थ शरीर हैं इससे बड़ा जगत में कोई धन नहीं है यद्यपि बहुत लोग धन के पीछे अपना यथार्थ और भविष्य सब कुछ भुल जाते हैं। उनको बस सब कुछ धन ही एक मात्र लक्ष्य होता है। अन्तहीन समय आने पर उन्हें जब तक ज्ञात होता है तब तक देर हो चुकी होती है। क्या मैंने थोड़ा सा समय अपने लिए जिया काश समय अपने लिए कुछ निकाल पाता तो आज इस अवस्था में मै नहीं होता जो परिवार का मात्र एक प्रमुख सहारा है वह आज दुसरे की आश लगाये बैठा है। कहने का तात्पर्य यह है कि वह समय हम पर निर्भर करता है थोडा सा ध्यान चिन्तन करने के लिए अपने लिए उपयुक्त समय निकाल कर इस शारीरिक मापदंड को ठीक किया जाय। और शरीर को नुकसान से बचाया जाए और स्वास्थ्य रखा जाय और जीवन जीने की कला को समझा जाय।   vinaysinghsubansi.blogspot.com पर इसी पर कुछ हेल्थ टिप्स दिए गए हैं जो शायद आपके लिए वरदान साबित हो - धन्यवाद